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चले गए पंछी कहां ना जाने

लिखो लेखनी अनुभूति मेरे मेरी अंतरंग संगिनी बनकर  कैसे तन्हाई का हाथ पकड़  काट रही ज़िंदगी का सफ़र ।  चहुंओर घना पसरा सन्नाटा   सब घर की निस्तब्ध दीवारें  वीरान दिखें बागों के दरख़्त  चले गये पंछी कहाँ ना जाने । चला गया जाने कहां सुहाना  अपने लोगों के साथ का दौर  उन्हीं घड़ियों की सुनहरी यादें  थिरकतीं स्मृतिपटल पर और । लिख तन्हाई की कंबल ओढ़े  गुज़र रही मेरी तन्हा ज़िन्दगी  जिसे भी देखती वही अकेला  करें किससे ठिठोली दिल्लगी । जब भी निकली घर से बाहर  जो भी मिला दिखा तन्हाई में  अलबत्ता मिला दिया स्वयं से  मुझको मुझसे ऐसी तन्हाई ने । किसके संग बैठ जी बहलायें  सभी घर निर्जन सुनसान पड़े  कौन किसे सांत्वना देवे भला  चित्त भी सबके बियाबान पड़े। अकेलेपन के इस रेगिस्तान में  तन्हाई नितान्त मैं मेरी परछाईं  ऐसा ही परिदृश्य दिखा हर घर  दूरस्थ हुए बच्चे रह गई तन्हाई । कभी अंगारों सी सुलगाती यह  कभी नागिन सी डंसती तन्हाई  पढ़ मन का अवसाद सीखा दी  तन्हा जीने का हुनर भी तन्हाई ...

सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर, छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा  हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर । वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर  मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से, जिस उर के उद्गार को कर सकी ना उजागर  उसे कर ली आभास धड़कन की आवाज़ से । तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे  प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से, समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये  तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के । रहे उजड़ा सा मन का गलियारा गवारा नहीं । गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं, तरस रहे तेरी आवाज़ को अरसे से कान मेरे  किसी ने मुझे मेरी प्रिया कह भी पुकारा नहीं ।  इमदाद---मदद  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित