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कभी ऐसे देगी दगा जिन्दगी

ना रहा पहले सा दम-खम  ना ताकत और जवानी बहुत लगाया लेप रूख पर पर हुआ ना रूप नूरानी । बहुत सजाई तन आभूषण पर लगी ना रूपसी रानी देख के दर्पण में प्रतिबिम्ब खुद हो गई पानी-पानी । बचपन खेला यौवन भोगा कभी ऐसी थी मुझमें रवानी कभी ऐसे देगी दगा जिन्दगी सोची ना पगली दीवानी । मस्त, व्यस्त ख़ुद में औलादें हसीं जिन्दगी लगे वीरानी देख बुढ़ापा दलदल में यों छलक रहा आँखों से पानी । शैल सिंह              

चॉंद आँगन उतर आओ जरा

रातें उदास ज़िंदगी की चांद आँगन उतर आओ जरा । तूफानों में घिर गई हूँ  अंजली भर फूल बरसाओ जरा । ठोकरों से थक गई हूँ  मन के द्वार महकाओ जरा । दुख की तपती धूप हूँ  उमड़ बादल बरस जाओ जरा । प्यासी लहर हूँ साहिलों पे  व्यथा के घाट सरसाओ जरा । द्वार बंद हैं सद्भाव के सुगम हमराह दिखलाओ जरा । मृग मरीचिका सी छली गई  सँभल चलना सिखलाओ जरा । बदरंग सपनों का नगर चटक नवरंग भर जाओ जरा । घाव अनवरत विश्वास के उर के दंश हर जाओ जरा । अमावस सी कारी रात मेरी चॉंद ऑंगन उतर आओ ज़रा । भोर की खिलती किरण सी  नेह भर ताप सहलाओ जरा । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

चाँद के साथ

दूर मंज़िल बहुत हूँ तनहा डगर में मगर बाँटने मेरी तनहाइयाँ  साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में । कभी डाले मुख पे घटाओं के घूँघट  कभी बादलों के झरोखों से झाँके  कभी सुख की लाली का आलम लिए  दर्द की माँग भर जाये चुपके से आके । कभी वैरागी मन की पगडंडियों पर तृषित अंजली का अमृत जल पिला के कभी फ़ायदा भोलेपन का उठाता  लुकाछिपी करता रहा आते जाते । कभी सोई अनुभूतियों को जगाता कभी थम सा जाता पराजय पे आके कभी झकझोर कर हँसाता गुदगुदाता इक निर्धूम दीया रोशनी की जला के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

नारी की पहचान

उत्सर्गमयी पूज्यनीया  क्यों बेचारी नारी हूं मैं  दासत्व निभाती पुरुषों की  ममता की महतारी हूं मैं। लहू तराशकर विश्व सृष्टि की  जिस्म निचोड़कर क्षुद्र पुरुष पर तन-मन सब कुछ वार किया  वह कंगालन नारी हूं मैं। स्नेहिल धार बहाने वाली निज का सर्वस्व लुटाने वाली राम की त्याज्या नारी हूं मैं  हाय कितनी बेचारी हूं मैं। हर जुबां पर गूंज रही जो वह तुलसी की चौपाई हूं मैं  ढोल,गंधार ,शूद्र, पशु ,नारी  तारण की अधिकारी हूं मैं। घर-घर की घरनी ये शोभा  क्यों दुत्कारी जाती अपनों से  जीवन का जब सौदा होता जलती दहेज की अन्ध प्रथा से। है राखी की मर्यादा नारी वात्सल्य ,ममता की मूरत न्यारी आदर्श पियारी देव पुरुष की वही अभागन नारी हूं मैं। कामदेव भी जिस पर रीझें पैंया जिससे चलना सीखें  पददलित स्वार्थी समाज की वह निरीह सुकुमारी हूं मैं। पर नहीं ! ऐ अभिमानी भद्र पुरुष  कितने रूप में तूने मुझको देखा  तूं व्यभिचारी गंदला मानव मैं ज्योतिपुंज और ज्योति शिखा । भोग विलास की वस्तु नहीं मैं प्रेरणा की साकार मूर्ति हूं उदार मेरा आंचल सदा कवि के कविता की पंक्...

माँ

हे स्नेह वत्सलता नाम तेरा  मैं रखूँ शिल्पी या रचना तूने जनकर यह जन-जन  कर दी सृष्टि संरचना । प्रकृति ने यह कैसा हाय अद्भुत संयोग बनाया है  जननी के उदर आवें से मेरा वजूद बनवाया है । जिस ममता की छाँह पली जिन नयनों की थी पुतली उस ममता की गोंद त्याज्य  आज चली पिया की डगरी । कैसे परम्परा के नाते माँ ने दृढ़ता से वियुक्त किया था  वात्सल्य के बदले माँ ने और मुझको क्या दिया था । कौन कल्पना कर सकता है  किसने मेरे उपर वज्रपात को देखा है  ससुराल की अंधी कारा में  माँ ने मुझको बन्दी बनने को भेजा है । मन पंछी मुक्त बिचरने वाला  कैसे पिंजर भीतर रह पायेगा  जो ग्रन्थि जीवन अर्पण का  वह ही अब बंधन कहलायेगा । माँ के विराम दायिनी आँचल की छाँव ,कहाँ हृदय मेरा ये पायेगा  सच्ची ममता के पदार्थ यहाँ अब बता माँ मुझ पर कौन लुटाएगा । माँ के गले लिपट जातीं थीं प्रायः  मेरे बाँहों की मुक्त लताएँ  जननी मन कितना व्याकुल है किस वत्सलता को व्यथा सुनाएँ । सांत्वना की लिख-लिख क्यों अब बोलो ? भेज रही हो पाती माँ  क्यों प्रिय बेटी के विछोह में ...

मेरी उपलब्धि

कितना खोया है मैंने  बस तुमने मेरा पाना देखा  कितना रोया है मैंने बस तुमने मेरा हँसना देखा । कितने सपने टूटे बिखरे मेरे बस तुमने सच होना देखा  कितनी रातें जाग बिताई मैंने  बस तुमने मेरा सोना देखा । मन का कल्मष धोया किसमें  बस तुमने मेरा भूलना देखा  कितनी पीड़ा दी है जग ने केवल तुमने मेरा सहना देखा । कितने शब्द वाण हैं बेधे मुझको  बस तुमने मेरा सुनना देखा  कितने शूल चुभे पद तल में बस तुमने मेरा चलना देखा । हैं कितने अवसाद गूंथे इनमें  बस तुमने मेरा गहना देखा  पत्र हीन जीवन बगिया में  बस तुमने मेरा खिलना देखा । कितना मन का सूना दर्पण  बस तुमने उसका भरना देखा  कितना दुःख दर्द सहा जीवन में  बस तुमने मेरा खुश रहना देखा । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरा अन्तर्द्वन्द्व

मैं कौन हूँ क्या नाम है मेरा  अपनी ज़िंदगी पति और बच्चों में सिमटी सम्पूर्ण अस्तित्व अपना गिरवी रखी हुई अमानत के समान  परिवार रूपी रंगमंच पर अद्भुत व्यक्तित्व का मंचन  बेजान,बेस्वाद,बेअसर । निष्ठा और समर्पण का बेताज ख़िताब  अनूठा उपहास ।आख़िर हो तो औरत ही ना । हर पल हर शख़्स से सामंजस्य बिठाने में दिन महीने साल का गुज़रते जाना विषम परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रखना । घर की देहरी की संकीर्णता ज़िम्मेदारियों का छलावा  उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ढलती उम्र की शाम अरे ! अपने तो लक्ष्य का पैमाना ही बदल गया  ना कोई मंज़िल ना कोई पड़ाव । घुटते देखना अहमियत को सिसकते देखना स्वत्व को, आशावादी दृष्टिकोण का दिशाहीन होना  वास्तविकता के धरातल पर धराशायी होता आत्मविश्वास  कुछ हासिल न कर पाने का मलाल । मक़सद और मज़बूत इरादों का तार-तार मंज़र , दम तोड़ती प्रतिभा आह ! भटकती हुई उम्मीदों की परवरिश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत की खोज  अपना कोई अनुगामी नहीं सबकी सह गामिनी बन चलती रही  निर्दिष्ट खोह की अतल गहराई में । वाह ! मिथ्या वरण अपनी ही वर्जनाओं मे...

मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता

ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , जब अंतस् का भाव जगे और हृदय आकुल हो जाये  भींच अंक में सकल वेदना  पंख पे कलम बिठा लेना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , भर जाये कोरी छाती जब मुझको बस इतना दे देना काग़ज़ का थोड़ा सा कोना प्रिय मेरे लिए बचा लेना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , जब पीड़ा वश से बाहर हो  और उसे मैं भूल ना पाऊँ  जिसे बाँट सके ना कोई अपना तब भागीदार बना लेना ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , भीगे दामन में इतना ऋण देना  शब्दों की ऊर्जा बाढ़ रोक ले मन का मीत मैं तुझमें ढूँढूँ अपनी प्रेयसी मुझे बना लेना ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , सहना मुश्किल हो जाये जब  और मैं शिथिल विकल हो जाऊँ  जीवन से उकता जाऊँ जब जीने की राह दिखा देना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छिपा लेना , प्यार भरी अतलांत नदी में  मन पलाश जब डूबना चाहे ऐ कविता मेरी प्रिय सहचरी अपनी कड़ियों में उलझा लेना  ऐ कविता शब्...