नारी की पहचान
उत्सर्गमयी पूज्यनीया
क्यों बेचारी नारी हूं मैं
दासत्व निभाती पुरुषों की
ममता की महतारी हूं मैं।
लहू तराशकर विश्व सृष्टि की
जिस्म निचोड़कर क्षुद्र पुरुष पर
तन-मन सब कुछ वार किया
वह कंगालन नारी हूं मैं।
स्नेहिल धार बहाने वाली
निज का सर्वस्व लुटाने वाली
राम की त्याज्या नारी हूं मैं
हाय कितनी बेचारी हूं मैं।
हर जुबां पर गूंज रही जो
वह तुलसी की चौपाई हूं मैं
ढोल,गंधार ,शूद्र, पशु ,नारी
तारण की अधिकारी हूं मैं।
घर-घर की घरनी ये शोभा
क्यों दुत्कारी जाती अपनों से
जीवन का जब सौदा होता
जलती दहेज की अन्ध प्रथा से।
है राखी की मर्यादा नारी
वात्सल्य ,ममता की मूरत न्यारी
आदर्श पियारी देव पुरुष की
वही अभागन नारी हूं मैं।
कामदेव भी जिस पर रीझें
पैंया जिससे चलना सीखें
पददलित स्वार्थी समाज की
वह निरीह सुकुमारी हूं मैं।
पर नहीं ! ऐ अभिमानी भद्र पुरुष
कितने रूप में तूने मुझको देखा
तूं व्यभिचारी गंदला मानव
मैं ज्योतिपुंज और ज्योति शिखा ।
भोग विलास की वस्तु नहीं मैं
प्रेरणा की साकार मूर्ति हूं
उदार मेरा आंचल सदा
कवि के कविता की पंक्ति हूं ।
मैं ज्ञान पिटारा कालिदास की
तुलसी की हूं ज्ञान विभा
जब पथ से विचलित पुरुष हुआ
बनती पथगामी उनकी दशो दिशा ।
तुझ पर इतना ऋण है मेरा
मेरे गौरव का सम्मान करो
हैं बहुत बड़ी हस्ती नारी की
उस पर तुम अभिमान करो ।
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