कभी ऐसे देगी दगा जिन्दगी
ना रहा पहले सा दम-खम
ना ताकत और जवानी
बहुत लगाया लेप रूख पर
पर हुआ ना रूप नूरानी ।
बहुत सजाई तन आभूषण
पर लगी ना रूपसी रानी
देख के दर्पण में प्रतिबिम्ब
खुद हो गई पानी-पानी ।
बचपन खेला यौवन भोगा
कभी ऐसी थी मुझमें रवानी
कभी ऐसे देगी दगा जिन्दगी
सोची ना पगली दीवानी ।
मस्त, व्यस्त ख़ुद में औलादें
हसीं जिन्दगी लगे वीरानी
देख बुढ़ापा दलदल में यों
छलक रहा आँखों से पानी ।
शैल सिंह
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