माँ
हे स्नेह वत्सलता नाम तेरा
मैं रखूँ शिल्पी या रचना
तूने जनकर यह जन-जन
कर दी सृष्टि संरचना ।
प्रकृति ने यह कैसा हाय
अद्भुत संयोग बनाया है
जननी के उदर आवें से
मेरा वजूद बनवाया है ।
जिस ममता की छाँह पली
जिन नयनों की थी पुतली
उस ममता की गोंद त्याज्य
आज चली पिया की डगरी ।
कैसे परम्परा के नाते माँ ने
दृढ़ता से वियुक्त किया था
वात्सल्य के बदले माँ ने
और मुझको क्या दिया था ।
कौन कल्पना कर सकता है
किसने मेरे उपर वज्रपात को देखा है
ससुराल की अंधी कारा में
माँ ने मुझको बन्दी बनने को भेजा है ।
मन पंछी मुक्त बिचरने वाला
कैसे पिंजर भीतर रह पायेगा
जो ग्रन्थि जीवन अर्पण का
वह ही अब बंधन कहलायेगा ।
माँ के विराम दायिनी आँचल की
छाँव ,कहाँ हृदय मेरा ये पायेगा
सच्ची ममता के पदार्थ यहाँ अब
बता माँ मुझ पर कौन लुटाएगा ।
माँ के गले लिपट जातीं थीं प्रायः
मेरे बाँहों की मुक्त लताएँ
जननी मन कितना व्याकुल है
किस वत्सलता को व्यथा सुनाएँ ।
सांत्वना की लिख-लिख क्यों अब
बोलो ? भेज रही हो पाती माँ
क्यों प्रिय बेटी के विछोह में
तब फट गई ना तेरी छाती माँ ।
आवां—मिट्टी का बर्तन बनाने वाली कुम्हार की भट्ठी
शैल सिंह
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