चॉंद आँगन उतर आओ जरा
रातें उदास ज़िंदगी की
चांद आँगन उतर आओ जरा ।
तूफानों में घिर गई हूँ
अंजली भर फूल बरसाओ जरा ।
ठोकरों से थक गई हूँ
मन के द्वार महकाओ जरा ।
दुख की तपती धूप हूँ
उमड़ बादल बरस जाओ जरा ।
प्यासी लहर हूँ साहिलों पे
व्यथा के घाट सरसाओ जरा ।
द्वार बंद हैं सद्भाव के
सुगम हमराह दिखलाओ जरा ।
मृग मरीचिका सी छली गई
सँभल चलना सिखलाओ जरा ।
बदरंग सपनों का नगर
चटक नवरंग भर जाओ जरा ।
घाव अनवरत विश्वास के
उर के दंश हर जाओ जरा ।
अमावस सी कारी रात मेरी
चॉंद ऑंगन उतर आओ ज़रा ।
भोर की खिलती किरण सी
नेह भर ताप सहलाओ जरा ।
शैल सिंह
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