मेरा अन्तर्द्वन्द्व
मैं कौन हूँ क्या नाम है मेरा
अपनी ज़िंदगी पति और बच्चों में सिमटी
सम्पूर्ण अस्तित्व अपना गिरवी रखी हुई अमानत के समान
परिवार रूपी रंगमंच पर अद्भुत व्यक्तित्व का मंचन
बेजान,बेस्वाद,बेअसर । निष्ठा और समर्पण का बेताज ख़िताब
अनूठा उपहास ।आख़िर हो तो औरत ही ना ।
हर पल हर शख़्स से सामंजस्य बिठाने में दिन महीने साल का गुज़रते जाना
विषम परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रखना ।
घर की देहरी की संकीर्णता ज़िम्मेदारियों का छलावा
उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ढलती उम्र की शाम
अरे ! अपने तो लक्ष्य का पैमाना ही बदल गया
ना कोई मंज़िल ना कोई पड़ाव ।
घुटते देखना अहमियत को सिसकते देखना स्वत्व को,
आशावादी दृष्टिकोण का दिशाहीन होना
वास्तविकता के धरातल पर धराशायी होता आत्मविश्वास
कुछ हासिल न कर पाने का मलाल ।
मक़सद और मज़बूत इरादों का तार-तार मंज़र , दम तोड़ती प्रतिभा
आह ! भटकती हुई उम्मीदों की परवरिश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत की खोज
अपना कोई अनुगामी नहीं सबकी सह गामिनी बन चलती रही
निर्दिष्ट खोह की अतल गहराई में ।
वाह ! मिथ्या वरण अपनी ही वर्जनाओं में बँधी
अपने फन और चाहतों के तर्पण पर
इस सुन्दर आशियाने को तराशते रहना
कला की बलि वेदी पर बस इसे ही निखारते रहना
एक घर का निर्माण, गृह लक्ष्मी की उपाधि का दंश
निष्ठुर समाज की रीति में जकड़ी
स्वयं के अधिकारों के लिए लड़ने का अदम्य साहस कहाँ ।
मर्यादा और सीमा ने हमीं से हमको छीना है
प्यार का अकूत धन भौतिक, आर्थिक , सुख सुविधाओं से सराबोर ज़िन्दगी
अभिलषित वस्तु का ख़ज़ाना आँचल में
हर पल यह अहसास अपना क्या है
खूंटे से बँधी गाय की तरह असहाय ,अपना स्थान कहाँ है
हर व्यक्ति की अपनी अपनी ख़ुशियों का अलग अलग मानदंड
पर मेरी ख़ुशी तो मेरी अभिरुचियाँ थीं
जो स्वाहा हुईं सात फेरों के बंधन में,
द्विज द्वारा दिए गये सात वचनों के निर्वहन में
भावनाओं के अथाह समंदर को लील गये कर्तव्यों के तूफ़ान ने
मतलब परस्त दुनिया से कैसी उम्मीद कैसा सहारा
काश ! कोई शिल्पी होता जो तराशता मुझे
कोई जौहरी होता जो परखता मुझे ।
शैल सिंह
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